गिर जाने दो, इस आभासी नीले आसमान को।
पागल टिटहरी, कब तक सम्भालोगी,
इस आडम्बर के बोझ को।
काँव काँव करते इन कौओँ के झुँड पर,
कितना अटूट विश्वास था,
कि
आसमान खागया है अण्डोँ को,
रोनी सी चोँच बनाकर,
कितने विकल हो रोते हैँ,
आसमान की पटकी हुयी आपदा पर।
कितने युग बीत गये हैँ पागल टिटहरी,
आसमान की ओर टाँग कर सोते हुये।
जिश्म से पैदा किये अण्डोँ को,
कितनी बार लूटाया है,
भाग्य पर रोते हुये॥
यह नीलाभ शुन्य, वायुमण्डल को भेद,
आँखोँ को बोध कराती,
प्रकाश की किरण है पागल,
दुष्ट कौओँ ने,
रहस्य की चादर ओढा,
शक्ति और शैतान का भय दिखा,
हर बार तुम्हारे अण्डो पर घात लगाया है।
टिटहरी, पाँवोँ पर खड़ी हो,
अब उखाड़नी होँगी पँख इन कौओँ की,
पीढियोँ से जिन्होँने तुझे रुलाया है।
रात के अंधेरे मेँ काला होता है अज्ञान सा आसमाँ,
नीलाभ तो सुबह की लाली मेँ क्रांति का प्रकाश लेकर आया है॥
पागल टिटहरी, कब तक सम्भालोगी,
इस आडम्बर के बोझ को।
काँव काँव करते इन कौओँ के झुँड पर,
कितना अटूट विश्वास था,
कि
आसमान खागया है अण्डोँ को,
रोनी सी चोँच बनाकर,
कितने विकल हो रोते हैँ,
आसमान की पटकी हुयी आपदा पर।
कितने युग बीत गये हैँ पागल टिटहरी,
आसमान की ओर टाँग कर सोते हुये।
जिश्म से पैदा किये अण्डोँ को,
कितनी बार लूटाया है,
भाग्य पर रोते हुये॥
यह नीलाभ शुन्य, वायुमण्डल को भेद,
आँखोँ को बोध कराती,
प्रकाश की किरण है पागल,
दुष्ट कौओँ ने,
रहस्य की चादर ओढा,
शक्ति और शैतान का भय दिखा,
हर बार तुम्हारे अण्डो पर घात लगाया है।
टिटहरी, पाँवोँ पर खड़ी हो,
अब उखाड़नी होँगी पँख इन कौओँ की,
पीढियोँ से जिन्होँने तुझे रुलाया है।
रात के अंधेरे मेँ काला होता है अज्ञान सा आसमाँ,
नीलाभ तो सुबह की लाली मेँ क्रांति का प्रकाश लेकर आया है॥

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