मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।
पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने,
कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ।
उड़ती धूल के दर्पण मेँ,
दहकते अंगारोँ सी,
विचलित इन किरणोँ ने,
पानी से लबालब झील की झलकी दिखा,
कितनी बार प्यासे मृगोँ से कुलाचेँ लगवाई हैँ॥
यथार्थ के जलते टीलोँ से टकरा कर मर जाना,
बेहतर है शायद,
इस आभासी झील के झिलमिलाते,
बहुरुपिये पानी से।
डकैतोँ की डकैती,
शायद नहीँ है बुरी,
शब्दोँ के मकड़जाल मेँ उलझी,
इस मायावी विकास की कहानी से॥
निश्चय ही कौए की चोँच से छीना जायेगा,
रोटी का टुकड़ा।
काश, समझ पाते,
कि प्रवंचना की तलवार है,
मीठे सुर और संगीत का यह मुखड़ा॥
तानसेन बनने के मोह मेँ,
हर बार सच मानलेते हो,
चालाक लोमड़ी की प्रशँसा और वादोँ को।
फिर से समझना होगा,
इन शब्दोँ के अर्थ और इरादोँ को॥
छलना के छलछलाते सागर मेँ कब तक डुबकी लगाओगे।
मगरमच्छ की पीठ पर सवार हो,
कैसे तट के कगार को छू पाओगे?
अब हाथ पैर हिलाने ही होँगे,
लहरोँ से हौसलेँ टकराने ही होँगे,
देख,
आग मेँ अपना जिश्म जलाकर परवाना,
शमाँ के गरुर को चाहता है झुकाना,
रक्त की लालिमा ले,
अंधेरे के आँचल को चिर,
वह देख,
नया सूरज निकल आया है।
चिड़ियोँ की चहचहाट मेँ,
जालिमोँ से लोहा लेने,
बलात्कार की शिकार,
उषा की अरुणाई ने,
लाने को नया इँकलाब,
हाथोँ मेँ लाल झँडा उठाया है॥
-------- प्यारेलाल भाम्बू ---------
पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने,
कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ।
उड़ती धूल के दर्पण मेँ,
दहकते अंगारोँ सी,
विचलित इन किरणोँ ने,
पानी से लबालब झील की झलकी दिखा,
कितनी बार प्यासे मृगोँ से कुलाचेँ लगवाई हैँ॥
यथार्थ के जलते टीलोँ से टकरा कर मर जाना,
बेहतर है शायद,
इस आभासी झील के झिलमिलाते,
बहुरुपिये पानी से।
डकैतोँ की डकैती,
शायद नहीँ है बुरी,
शब्दोँ के मकड़जाल मेँ उलझी,
इस मायावी विकास की कहानी से॥
निश्चय ही कौए की चोँच से छीना जायेगा,
रोटी का टुकड़ा।
काश, समझ पाते,
कि प्रवंचना की तलवार है,
मीठे सुर और संगीत का यह मुखड़ा॥
तानसेन बनने के मोह मेँ,
हर बार सच मानलेते हो,
चालाक लोमड़ी की प्रशँसा और वादोँ को।
फिर से समझना होगा,
इन शब्दोँ के अर्थ और इरादोँ को॥
छलना के छलछलाते सागर मेँ कब तक डुबकी लगाओगे।
मगरमच्छ की पीठ पर सवार हो,
कैसे तट के कगार को छू पाओगे?
अब हाथ पैर हिलाने ही होँगे,
लहरोँ से हौसलेँ टकराने ही होँगे,
देख,
आग मेँ अपना जिश्म जलाकर परवाना,
शमाँ के गरुर को चाहता है झुकाना,
रक्त की लालिमा ले,
अंधेरे के आँचल को चिर,
वह देख,
नया सूरज निकल आया है।
चिड़ियोँ की चहचहाट मेँ,
जालिमोँ से लोहा लेने,
बलात्कार की शिकार,
उषा की अरुणाई ने,
लाने को नया इँकलाब,
हाथोँ मेँ लाल झँडा उठाया है॥
-------- प्यारेलाल भाम्बू ---------



