Thursday, 1 November 2018

इन सागर की गहराइयों में...

इन सागर की गहराइयोँ मेँ,
बलखाती, इठलाती व्हेल सा,
एक सपना था।
लहरोँ के उफनते फेन सा,
न जाने कब टूट गया।
सालोँ पहले,
जुल्म की जागीर को,
जड़ से मिटाने,
साथियोँ के कुछ हाथ बढे थे,
स्वार्थोँ के कोहरे ने,
उनको भी लूट लिया।
भ्रम ही सही,
 चलना नहीँ भूले हैँ पाँव,
मंजिल की तलाश मेँ,
माना कि एक सम्बल था राह का,
वह भी छूट गया॥
सपने तो बनते हैँ,
 बिगड़ते हैँ।
साथी भी लड़ते हैँ,
झगड़ते हैँ॥
मँजिलोँ का ठौर और ठिकाना तो,
 हर कदम पर बदलता है।
सुदूर अटक जाती हैँ निगाहेँ,
क्षितिज के नाम पर,
फासला तो कदम कदम पर फिसलता है॥
सम्बल ही तो है,
जो फिर नये सपने बुनता है।
एकाकी के अधुरेपन को मिटाने,
फिर नये साथी चुनता है॥
चिराग उम्मीदोँ के यूँ न बुझाओ,
कि सपने भी डर से थर्राने लगेँ।
 अब, बस भी करो!
बहूत लूटा है,
आस्था और विश्वास के नाम पर,
ऐसा न हो,
कि डाकू और लुटेरे भी,
तुम्हारी बेहयाई पर शर्माने लगेँ॥
देखते हो!
टाँगे तोड़ी थी जिस मज़लूम की तुने,
उसका बेटा,
अब आवाज उठाने लगा है।
रात की छाती को चीर,
पूर्व के आँगन मेँ,
देख, वह लाल सूरज,
आशा की नयी किरण बिखराने लगा है॥
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰

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