Friday, 9 November 2018

मृग मरीचिका माना कि मति भ्रम नहीं है..

मृग मरिचिका, माना कि मतिभ्रम नहीँ है।
पर यथार्थ कि भ्रमपूर्ण अनुभूतियोँ ने,

कब प्यासोँ की प्यास बुझाई हैँ।
उड़ती धूल के दर्पण मेँ,
दहकते अंगारोँ सी,
विचलित इन किरणोँ ने,
पानी से लबालब झील की झलकी दिखा,
कितनी बार प्यासे मृगोँ से कुलाचेँ लगवाई हैँ॥

 यथार्थ के जलते टीलोँ से टकरा कर मर जाना,
बेहतर है शायद,
इस आभासी झील के झिलमिलाते,
बहुरुपिये पानी से।

डकैतोँ की डकैती,
शायद नहीँ है बुरी,
शब्दोँ के मकड़जाल मेँ उलझी,
इस मायावी विकास की कहानी से॥

निश्चय ही कौए की चोँच से छीना जायेगा,
रोटी का टुकड़ा।
काश, समझ पाते,
 कि प्रवंचना की तलवार है,

मीठे सुर और संगीत  का यह मुखड़ा॥

तानसेन बनने के मोह मेँ,

हर बार सच मानलेते हो,
 
चालाक लोमड़ी की प्रशँसा और वादोँ को।
फिर से समझना होगा,
इन शब्दोँ के अर्थ और इरादोँ को॥

छलना के छलछलाते सागर मेँ कब तक डुबकी लगाओगे।

मगरमच्छ की पीठ पर सवार हो,

कैसे तट के कगार को छू पाओगे?

अब हाथ पैर हिलाने ही होँगे,

लहरोँ से हौसलेँ टकराने ही होँगे,
देख,
आग मेँ अपना जिश्म जलाकर परवाना,

शमाँ के गरुर को चाहता है झुकाना,

रक्त की लालिमा ले,
अंधेरे के आँचल को चिर,

वह देख,
 नया सूरज निकल आया है।

चिड़ियोँ की चहचहाट मेँ,
जालिमोँ से लोहा लेने,

बलात्कार की शिकार,
उषा की अरुणाई ने,

लाने को नया इँकलाब,
हाथोँ मेँ लाल झँडा उठाया है॥
--------  प्यारेलाल भाम्बू ---------

Monday, 5 November 2018

गिर जाने दो, इस आभासी नीले आसमान को...

गिर जाने दो, इस आभासी नीले आसमान को।
पागल टिटहरी, कब तक सम्भालोगी,
इस आडम्बर के बोझ को।
काँव काँव करते इन कौओँ के झुँड पर,
कितना अटूट विश्वास था,
कि
आसमान खागया है अण्डोँ को,
रोनी सी चोँच बनाकर,
कितने विकल हो रोते हैँ,
आसमान की पटकी हुयी आपदा पर।
कितने युग बीत गये हैँ पागल टिटहरी,
आसमान की ओर टाँग कर सोते हुये।
जिश्म से पैदा किये अण्डोँ को,
कितनी बार लूटाया है,
भाग्य पर रोते हुये॥
यह नीलाभ शुन्य, वायुमण्डल को भेद,
 आँखोँ को बोध कराती,
प्रकाश की किरण है पागल,
दुष्ट कौओँ ने,
रहस्य की चादर ओढा,
शक्ति और शैतान का भय दिखा,
हर बार तुम्हारे अण्डो पर घात लगाया है।
टिटहरी, पाँवोँ पर खड़ी हो,
अब उखाड़नी होँगी पँख इन कौओँ की,
पीढियोँ से जिन्होँने तुझे रुलाया है।
रात के अंधेरे मेँ काला होता है  अज्ञान सा आसमाँ,
नीलाभ तो सुबह की लाली मेँ क्रांति का प्रकाश लेकर आया है॥

Sunday, 4 November 2018

पहली बार....

पहली बार,
जब मानव समाज,
मालिक और दास के रुप मेँ बँटा,
कितना सीधा था यह भेद?
युद्ध मेँ हारे हुये,
पड़ौसी कबीले के यह लोग,
पहली बार पशुओँ की तरह,
हल मेँ जुते थे।
पसीने से लथपथ हारे हुये जिश्मोँ पर,
क्रुरता पूर्वक, अवज्ञा हेतु,
विजेताओँ के कोड़े पड़े थे।
कोड़ोँ के दर्द से बिलबिलाते हुये,
हारे हुये इन्सान ने,
शायद, तब,
पहली बार,
घावोँ से अधिक सालनेवाली,
गुलामी की पीड़ा को,
अन्तर्मन मेँ महसूस किया होगा।
- प्यारेलाल भाम्बू -

Thursday, 1 November 2018

इन सागर की गहराइयों में...

इन सागर की गहराइयोँ मेँ,
बलखाती, इठलाती व्हेल सा,
एक सपना था।
लहरोँ के उफनते फेन सा,
न जाने कब टूट गया।
सालोँ पहले,
जुल्म की जागीर को,
जड़ से मिटाने,
साथियोँ के कुछ हाथ बढे थे,
स्वार्थोँ के कोहरे ने,
उनको भी लूट लिया।
भ्रम ही सही,
 चलना नहीँ भूले हैँ पाँव,
मंजिल की तलाश मेँ,
माना कि एक सम्बल था राह का,
वह भी छूट गया॥
सपने तो बनते हैँ,
 बिगड़ते हैँ।
साथी भी लड़ते हैँ,
झगड़ते हैँ॥
मँजिलोँ का ठौर और ठिकाना तो,
 हर कदम पर बदलता है।
सुदूर अटक जाती हैँ निगाहेँ,
क्षितिज के नाम पर,
फासला तो कदम कदम पर फिसलता है॥
सम्बल ही तो है,
जो फिर नये सपने बुनता है।
एकाकी के अधुरेपन को मिटाने,
फिर नये साथी चुनता है॥
चिराग उम्मीदोँ के यूँ न बुझाओ,
कि सपने भी डर से थर्राने लगेँ।
 अब, बस भी करो!
बहूत लूटा है,
आस्था और विश्वास के नाम पर,
ऐसा न हो,
कि डाकू और लुटेरे भी,
तुम्हारी बेहयाई पर शर्माने लगेँ॥
देखते हो!
टाँगे तोड़ी थी जिस मज़लूम की तुने,
उसका बेटा,
अब आवाज उठाने लगा है।
रात की छाती को चीर,
पूर्व के आँगन मेँ,
देख, वह लाल सूरज,
आशा की नयी किरण बिखराने लगा है॥
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰